सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब गृहिणियों के काम की भी तय हुई कीमत, हर महीने 30,000 रुपये का मानक मूल्य

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By: Rashmi Gupta

On: Monday, June 15, 2026 6:26 PM

गृहिणियों के सम्मान को मिला नया कानूनी दर्जा

भारत में करोड़ों महिलाएं ऐसी हैं जो अपने पूरे जीवन का बड़ा हिस्सा घर, परिवार और बच्चों की देखभाल में लगा देती हैं। सुबह से लेकर रात तक घर के अनगिनत कामों में जुटी रहने वाली इन महिलाओं का योगदान हमेशा से समाज की रीढ़ माना जाता रहा है। लेकिन विडंबना यह रही कि उनके इस अथक श्रम की आर्थिक कीमत कभी तय नहीं की गई।

अब देश की सर्वोच्च अदालत ने इस सोच को बदलने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि घर संभालने वाली महिलाएं किसी पर निर्भर नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अदालत ने पहली बार गृहिणियों के घरेलू कार्यों की न्यूनतम आर्थिक कीमत 30,000 रुपये प्रतिमाह निर्धारित की है।

यह फैसला केवल एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में लाखों परिवारों और महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करेगा।

आखिर क्या था पूरा मामला?

यह मामला पंजाब की रहने वाली 33 वर्षीय महिला रेशमा से जुड़ा था। वर्ष 2001 में एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। रेशमा एक गृहिणी थीं और अपना पूरा समय परिवार तथा बच्चों की देखभाल में लगाती थीं।

उनकी मृत्यु के बाद पति और बच्चों ने मुआवजे की मांग करते हुए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) में याचिका दायर की।

ट्रिब्यूनल ने वर्ष 2003 में केवल 2.42 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया। कारण यह बताया गया कि रेशमा की कोई नियमित आय नहीं थी और वे किसी नौकरी या व्यवसाय से जुड़ी नहीं थीं।

परिवार ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला आगे बढ़ता हुआ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर लगभग 8.43 लाख रुपये कर दिया।

लेकिन परिवार यहीं नहीं रुका और न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कैसे बदल दिया पूरा गणित?

11 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा कि किसी गृहिणी की मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि उसके द्वारा किए जा रहे घरेलू देखभाल कार्यों का भी नुकसान होता है।

कोर्ट ने इसे “Loss of Domestic Care” यानी घरेलू देखभाल की क्षति माना।

इसके आधार पर अदालत ने रेशमा के परिवार के लिए मुआवजे की पुनर्गणना की और पहले के लगभग 8 लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 62 लाख रुपये से अधिक कर दिया।

यह केवल एक परिवार के लिए राहत नहीं थी, बल्कि देश की सभी गृहिणियों के योगदान को कानूनी मान्यता देने वाला फैसला बन गया।

गृहिणी के काम की कीमत 30,000 रुपये क्यों तय की गई?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने 30,000 रुपये प्रति माह का आंकड़ा कैसे तय किया।

अदालत ने इसके लिए आर्थिक सिद्धांतों और सामाजिक वास्तविकताओं का सहारा लिया।

कोर्ट ने माना कि एक गृहिणी केवल खाना बनाने तक सीमित नहीं होती।

वह कई भूमिकाएं निभाती है जैसे—

  • रसोइया
  • बच्चों की देखभाल करने वाली
  • शिक्षक
  • बुजुर्गों की देखभाल करने वाली
  • घरेलू प्रबंधक
  • भावनात्मक सहयोग देने वाली सदस्य

यदि इन सभी कार्यों के लिए अलग-अलग लोगों को नियुक्त किया जाए तो एक परिवार को हर महीने हजारों रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

इसी आधार पर अदालत ने 30,000 रुपये को न्यूनतम मानक राशि माना।

हर तीन साल में बढ़ेगी यह राशि

सुप्रीम कोर्ट ने केवल वर्तमान राशि तय करके मामला समाप्त नहीं किया।

अदालत ने यह भी कहा कि समय के साथ महंगाई बढ़ती है और घरेलू कामों का मूल्य भी बढ़ता है।

इसीलिए अदालत ने निर्देश दिया कि इस राशि में हर तीन साल बाद 10 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी।

इसका मतलब यह है कि भविष्य में घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्य और अधिक बढ़ेगा।

वर्किंग महिलाओं को भी मिलेगा फायदा

फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह केवल गृहिणियों तक सीमित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई महिला नौकरी करती है और साथ ही घर की जिम्मेदारियां भी संभालती है, तो दुर्घटना की स्थिति में उसकी सैलरी के अलावा घरेलू कार्यों का मूल्य भी अलग से जोड़ा जाएगा।

उदाहरण के तौर पर यदि कोई महिला बैंक में नौकरी करती है और घर की देखभाल भी करती है, तो दुर्घटना में मृत्यु होने पर मुआवजा तय करते समय—

  • उसकी नौकरी से होने वाली आय को शामिल किया जाएगा।
  • साथ ही घरेलू कार्यों के लिए 30,000 रुपये प्रतिमाह के मानक मूल्य को भी जोड़ा जाएगा।

इससे कामकाजी महिलाओं को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी।

महिलाओं के बिना नहीं चल सकती देश की अर्थव्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़ों का उल्लेख किया।

अदालत ने 2019 के टाइम यूज सर्वे का हवाला दिया।

इस सर्वे के अनुसार 15 से 59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन औसतन 7 घंटे से अधिक समय बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों में लगाती हैं।

इसके विपरीत पुरुष घरेलू कार्यों में केवल लगभग 3 घंटे का समय देते हैं।

यानी घरेलू जिम्मेदारियों का अधिकांश बोझ आज भी महिलाओं पर ही है।

महिलाओं का अनपेड वर्क कितना बड़ा है?

अदालत ने यह भी माना कि महिलाओं द्वारा किया जाने वाला बिना वेतन वाला काम देश की अर्थव्यवस्था में विशाल योगदान देता है।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में महिलाओं का अनपेड केयर वर्क देश की जीडीपी का लगभग 15 से 17 प्रतिशत तक माना जा सकता है।

यदि इसे वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखें तो यह योगदान लाखों करोड़ रुपये के बराबर बैठता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो महिलाएं हर साल देश की अर्थव्यवस्था के लिए विशाल मूल्य का निर्माण करती हैं, लेकिन उन्हें उसके बदले कोई वेतन नहीं मिलता।

रिप्लेसमेंट कॉस्ट थ्योरी क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रिप्लेसमेंट कॉस्ट एप्रोच का उल्लेख किया।

इसका मतलब है कि यदि गृहिणी अपना काम न करे तो वही काम करने के लिए कितने लोगों को नियुक्त करना पड़ेगा।

मान लीजिए किसी परिवार में गृहिणी नहीं है।

तब परिवार को आवश्यकता होगी—

  • खाना बनाने के लिए कुक
  • सफाई के लिए मेड
  • बच्चों के लिए ट्यूटर
  • बुजुर्गों के लिए केयरटेकर
  • घरेलू प्रबंधन के लिए मैनेजर

इन सभी सेवाओं की लागत जोड़ने पर हर महीने हजारों रुपये का खर्च आएगा।

यही एक गृहिणी के वास्तविक आर्थिक मूल्य का संकेत देता है।

अवसर लागत का सिद्धांत क्या कहता है?

अदालत ने दूसरा आधार “Opportunity Cost Approach” को बनाया।

इस सिद्धांत के अनुसार यदि कोई महिला घर संभालने के बजाय बाहर नौकरी करती तो वह कितनी आय अर्जित कर सकती थी।

कई शिक्षित महिलाएं परिवार की जिम्मेदारियों के कारण नौकरी या व्यवसाय नहीं कर पातीं।

वे अपनी संभावित कमाई का त्याग करती हैं ताकि परिवार को समय दे सकें।

अदालत ने माना कि यह त्याग भी आर्थिक मूल्य रखता है।

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को कहा राष्ट्र निर्माता

फैसले का सबसे प्रेरणादायक हिस्सा अदालत की टिप्पणियां रहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहिणियां केवल घर संभालने वाली महिलाएं नहीं हैं, बल्कि वे “Nation Builders” यानी राष्ट्र निर्माता हैं।

कोर्ट के अनुसार घर में बच्चों के संस्कार, शिक्षा, अनुशासन और व्यक्तित्व निर्माण में महिलाओं की सबसे बड़ी भूमिका होती है।

एक मां केवल बच्चे को जन्म नहीं देती, बल्कि उसे जीवन के लिए तैयार भी करती है।

यही बच्चे आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक और उद्यमी बनते हैं।

इसलिए महिलाओं का योगदान सीधे तौर पर देश के मानव संसाधन निर्माण से जुड़ा हुआ है।

पुरुषों की भूमिका को भी मिली मान्यता

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी परिवार में पुरुष घरेलू जिम्मेदारियां निभा रहा है तो उसके कार्यों को भी सम्मान मिलना चाहिए।

अदालत ने माना कि बदलते समय में कुछ परिवारों में पुरुष भी होममेकर की भूमिका निभाते हैं।

ऐसे मामलों में भी इसी तरह की सोच अपनाई जा सकती है।

हालांकि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में अधिकांश घरेलू कार्य महिलाओं द्वारा किए जाते हैं, इसलिए इस फैसले का केंद्रबिंदु महिलाओं के योगदान को मान्यता देना रहा।

अदालतों को मिला सख्त संदेश

रेशमा के मामले में न्याय मिलने में लगभग 25 वर्ष लग गए।

इस लंबी देरी पर सुप्रीम Court ने चिंता व्यक्त की।

अदालत ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों का जल्दी निपटारा होना चाहिए।

इसके लिए हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनलों को कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए।

एक साल के भीतर निपटारा करने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना मुआवजा मामलों को यथासंभव एक वर्ष के भीतर निपटाने का प्रयास होना चाहिए।

शुरुआत में ही दस्तावेज जमा कराए जाएं

अदालत ने निर्देश दिया कि आवश्यक दस्तावेज शुरुआती चरण में ही जमा कराए जाएं ताकि बाद में अनावश्यक देरी न हो।

पुराने मामलों को प्राथमिकता मिले

देशभर के हाईकोर्टों से कहा गया कि पुराने मोटर दुर्घटना मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए।

जरूरत पड़ने पर विशेष बेंच भी बनाई जा सकती हैं।

यह फैसला क्यों माना जा रहा है ऐतिहासिक?

यह फैसला कई कारणों से ऐतिहासिक माना जा रहा है।

पहला, इसने घरेलू कार्यों को आर्थिक मूल्य दिया।

दूसरा, इसने महिलाओं के योगदान को कानूनी मान्यता प्रदान की।

तीसरा, इसने बीमा कंपनियों और ट्रिब्यूनलों की उस सोच को चुनौती दी जिसमें गृहिणियों को “कमाई न करने वाला व्यक्ति” मान लिया जाता था।

चौथा, यह फैसला आने वाले समय में हजारों दुर्घटना मुआवजा मामलों में नई दिशा तय करेगा।

समाज पर क्या पड़ेगा प्रभाव?

इस फैसले का असर केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा।

यह समाज में महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की क्षमता रखता है।

अब यह संदेश और मजबूत हुआ है कि घर का काम कोई मामूली या मुफ्त सेवा नहीं है।

घरेलू कार्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना किसी दफ्तर, फैक्ट्री या व्यवसाय में किया जाने वाला काम।

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को “निर्भर” नहीं बल्कि “राष्ट्र निर्माता” कहा है।

भविष्य में क्या बदल सकता है?

इस फैसले के बाद कई नई बहसें शुरू हो गई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आगे चलकर—

तलाक और एलिमनी मामलों में प्रभाव

घरेलू कार्यों के आर्थिक मूल्य को तलाक और गुजारा भत्ता मामलों में भी आधार बनाया जा सकता है।

संपत्ति में हिस्सेदारी के विवाद

पति-पत्नी की संयुक्त संपत्ति के मामलों में घरेलू योगदान को अधिक महत्व मिल सकता है।

महिलाओं के आर्थिक अधिकारों पर नई चर्चा

घरेलू कार्यों के लिए सीधे आर्थिक सहायता या यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी योजनाओं पर भी चर्चा तेज हो सकती है।

सामाजिक सोच में बदलाव

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह हो सकता है कि घर संभालने वाली महिलाओं के श्रम को सम्मान और पहचान मिले, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाता रहा है।

Rashmi Gupta

Rashmi Gupta एक अनुभवी हिंदी कंटेंट राइटर और डिजिटल मीडिया लेखिका हैं, जो ऑटोमोबाइल, टेक्नोलॉजी, सरकारी योजनाओं, शिक्षा और ट्रेंडिंग खबरों जैसे विषयों पर सरल और विश्वसनीय लेख लिखने के लिए जानी जाती हैं। उन्हें डिजिटल पत्रकारिता और SEO फ्रेंडली कंटेंट लेखन का अच्छा अनुभव है।

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