भारत के सबसे बड़े ब्लॉगर्स में से एक, सौरभ जोशी इन दिनों एक नए विवाद के केंद्र में आ गए हैं। इस विवाद की वजह कोई आपसी लड़ाई या निजी जिंदगी नहीं, बल्कि देश की एक बेहद महत्वपूर्ण नीति यानी एथेनॉल मिक्स्ड पेट्रोल (E20 Fuel) है। सौरभ जोशी ने अपने एक यूट्यूब ब्लॉग में अपनी महंगी मर्सिडीज कार के माइलेज को लेकर एक बड़ा दावा किया, जिसके बाद इंटरनेट से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में एक नई बहस छिड़ गई है। हालांकि, सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह रही कि विवाद बढ़ते ही सौरभ जोशी ने अपने वीडियो से उस हिस्से को चुपचाप हटा दिया। इसके बाद से सोशल मीडिया पर यूजर्स उनके डरने और सरकार के दबाव में आने को लेकर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है, सौरभ जोशी ने क्या दावा किया था, और देश में एथेनॉल को लेकर क्या नियम हैं।
यूट्यूब सनसनी सौरभ जोशी के एक ब्लॉग ने कैसे मचाया तहलका
सौरभ जोशी अपने दैनिक जीवन और गाड़ियों के शौक के लिए जाने जाते हैं। उनके ब्लॉग्स को करोड़ों लोग देखते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने चैनल पर एक नया ब्लॉग अपलोड किया था। इस ब्लॉग में वह अपनी मर्सिडीज कार में सफर कर रहे थे। वीडियो के दौरान उन्होंने अपनी कार की परफॉर्मेंस और उसके गिरते माइलेज पर बात करनी शुरू की। सौरभ जोशी ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि जब से वह अपनी कार में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol) का इस्तेमाल कर रहे हैं, तब से उनकी गाड़ी की स्थिति बेहद खराब हो गई है। उनके साथ गाड़ी में मौजूद उनकी पत्नी और कंटेंट क्रिएटर अवंतिका भट्ट ने भी इस पर गहरी चिंता जताई। अवंतिका का कहना था कि इतनी मोटी रकम खर्च करके मर्सिडीज जैसी लक्जरी कार खरीदने के बाद भी अगर इस तरह की तकनीकी समस्याओं और मानसिक परेशानी से गुजरना पड़े, तो यह वाकई निराशाजनक है।
मर्सिडीज का माइलेज 17 से सीधे 5 पर आया: क्या था सौरभ का दावा?
सौरभ जोशी ने अपने वीडियो में जो आंकड़े शेयर किए, उसने हर किसी को चौंका दिया। उन्होंने दावा किया कि जिस मर्सिडीज कार का माइलेज पहले सामान्य तौर पर 17 किलोमीटर प्रति लीटर के आसपास रहता था, वह एथेनॉल मिक्स पेट्रोल डलवाने के बाद अचानक गिरकर सिर्फ 9 किलोमीटर प्रति लीटर पर आ गया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। सौरभ ने आगे बताया कि अगले ही दिन जब उन्होंने कार का डैशबोर्ड देखा, तो उस पर माइलेज का आंकड़ा घटकर महज 5 किलोमीटर प्रति लीटर दिखा रहा था।
इसके साथ ही उन्होंने कार की ड्राइविंग रेंज को लेकर भी एक बड़ा दावा किया। सौरभ के मुताबिक, पहले जब वह अपनी कार का टैंक फुल करवाते थे, तो डिजिटल स्क्रीन पर गाड़ी की ड्राइविंग रेंज लगभग 800 किलोमीटर दिखाई देती थी। लेकिन अब एथेनॉल वाले ईंधन के कारण यह रेंज घटकर सिर्फ 480 किलोमीटर रह गई है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अब उन्हें पेट्रोल पंप पर जाकर तेल भरवाने में भी डर लगने लगा है। उन्हें लगातार यह चिंता सता रही है कि कहीं इस पेट्रोल की वजह से उनकी गाड़ी का कीमती इंजन हमेशा के लिए खराब न हो जाए। हालांकि, वीडियो में उन्होंने राहत जताते हुए यह भी जोड़ा कि उनके पास मर्सिडीज की इलेक्ट्रिक जी-वैगन (Electric G-Wagen) भी है, इसलिए उसमें एथेनॉल मिक्स पेट्रोल को लेकर कोई झंझट या चिंता नहीं रहती।
वीडियो से अचानक हटा एथेनॉल वाला हिस्सा: डर या दबाव?

सौरभ जोशी का यह वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, इंटरनेट पर तहलका मच गया। हजारों लोग इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब लोगों ने नोटिस किया कि सौरभ जोशी ने अपने उस ब्लॉग से एथेनॉल की शिकायत करने वाले पूरे हिस्से को चुपचाप एडिट करके हटा दिया है। वीडियो से इस पार्ट के गायब होते ही सोशल मीडिया पर यूजर्स भड़क गए और उन्होंने सौरभ जोशी को ट्रोल करना शुरू कर दिया।
यूजर्स का आरोप है कि सौरभ ने सरकार या सिस्टम के डर से इस वीडियो को बदला है। एक यूजर ने लिखा कि एथेनॉल पर सौरभ जोशी का वीडियो वायरल होने के बाद डिलीट हो जाना यह साबित करता है कि सरकार से लड़ना हर किसी के बस की बात नहीं है। वहीं एक अन्य यूजर ने तंज कसते हुए लिखा कि एथेनॉल वाला पार्ट तो वीडियो से हटा दिया गया है, अब अगला कदम शायद एक माफीनामा (Apology Video) ही होगा। कई लोगों ने यह भी कमेंट किया कि इस देश में सच बोलने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। कुछ यूजर्स ने तो यहां तक कह दिया कि अब सौरभ जोशी के घर पर ईडी (Enforcement Directorate) की जांच बैठ सकती है, तो कुछ ने उन्हें ‘एंटी-नेशनल’ तक करार दे दिया। कुल मिलाकर, जनता का यह साफ मानना है कि भारी दबाव के कारण ही सौरभ को अपना कदम पीछे खींचना पड़ा।
समझिए क्या है E20 पेट्रोल और साल 2026 में इसकी क्या स्थिति है
इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर एथेनॉल मिक्स पेट्रोल क्या है और इसे लेकर सरकार की क्या नीति है। भारत सरकार ने देश में प्रदूषण को कम करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की योजना शुरू की थी। मौजूदा समय में पूरे देश में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल, जिसे E20 पेट्रोल कहा जाता है, पूरी तरह से लागू हो चुका है।
शुरुआत में केंद्र सरकार ने इस E20 पेट्रोल को पूरे देश में लागू करने के लिए साल 2030 तक का लक्ष्य रखा था। लेकिन सरकार ने इस दिशा में बेहद तेजी से काम किया और समय से बहुत पहले, यानी दिसंबर 2025 में ही इस लक्ष्य को शत-प्रतिशत पूरा कर लिया। यही कारण है कि आज देश के सभी पेट्रोल पंप्स पर E20 पेट्रोल ही मुख्य ईंधन के रूप में उपलब्ध और लागू है। सरकार का मानना है कि एथेनॉल को गन्ने, मक्के और खराब हो चुके अनाजों से तैयार किया जाता है, जिससे भारतीय किसानों को फायदा होता है और देश का पैसा बाहर जाने से बचता है।
एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल को लेकर आम जनता में क्यों है भारी चिंता?
भले ही सरकार E20 पेट्रोल को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रही हो, लेकिन वाहन मालिकों और कुछ विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर गहरा विरोध और चिंताएं बनी हुई हैं। विरोध करने वालों का सबसे बड़ा तर्क यह है कि भारत की सड़कों पर दौड़ने वाली लगभग 80 प्रतिशत गाड़ियां पुरानी तकनीकों पर आधारित हैं। ये गाड़ियां E10 यानी सिर्फ 10 प्रतिशत एथेनॉल वाले पेट्रोल को झेलने के हिसाब से डिजाइन की गई थीं।
जब इन पुरानी गाड़ियों में 20 प्रतिशत एथेनॉल वाला पेट्रोल डाला जाता है, तो इसके कई दुष्प्रभाव सामने आने का दावा किया जा रहा है:
- माइलेज में गिरावट: एथेनॉल की ऊर्जा घनत्व (Energy Density) सामान्य पेट्रोल के मुकाबले कम होती है। इसका मतलब है कि समान मात्रा में एथेनॉल कम ऊर्जा पैदा करता है, जिससे गाड़ियों का माइलेज स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है।
- इंजन के पार्ट्स को नुकसान: एथेनॉल स्वभाव से नमी को सोखता है (Hydroscopic)। यह ईंधन टैंक और पाइपलाइनों में पानी जमा कर सकता है। इसके अलावा, एथेनॉल के कारण गाड़ियों के इंजन में लगे रबर के पार्ट्स, प्लास्टिक की नलियां और गैस्केट धीरे-धीरे गलने या खराब होने लगते हैं।
- रखरखाव का खर्च: माइलेज कम होने और इंजन के हिस्सों के जल्दी खराब होने की वजह से आम जनता पर गाड़ी की मेंटेनेंस का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है।
सरकारी पक्ष और नितिन गडकरी का दावा: क्या वाकई सुरक्षित है एथेनॉल?

आम जनता और वाहन चालकों की इन चिंताओं के विपरीत, केंद्र सरकार, पेट्रोलियम मंत्रालय और कई ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हैं। सरकार का साफ कहना है कि E10 तकनीक के लिए बनी गाड़ियों में भी अगर E20 पेट्रोल का इस्तेमाल किया जाता है, तो उससे इंजन को कोई बड़ा या गंभीर नुकसान नहीं होता है।
इस विषय पर केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया था कि अभी तक वैज्ञानिक या तकनीकी रूप से ऐसा कोई भी मामला सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के इस्तेमाल से किसी गाड़ी का इंजन खराब हुआ है या उसे कोई स्थाई नुकसान पहुंचा है। सरकार लगातार यह प्रचार कर रही है कि एथेनॉल एक स्वच्छ ईंधन है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आती है। साथ ही, इससे भारत का कच्चे तेल का आयात बिल अरबों डॉलर कम हो जाता है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद फायदेमंद है।
अखिलेश यादव का बड़ा आरोप: एथेनॉल को बताया मुनाफाखोरी का नया नाम

सौरभ जोशी के इस मामले ने अब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ भी ले लिया है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए एथेनॉल नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अखिलेश यादव ने अपने पोस्ट में लिखा कि एथेनॉल दरअसल मुनाफाखोरी का एक नया नाम बन चुका है। उन्होंने इसे ‘सरकारी मिलावट’ का एक ऐसा त्रिकोण बताया है, जिसमें सरकार, एथेनॉल बनाने वाले बड़े उद्योगपति और तेल कंपनियों की आपस में गहरी साझेदारी है। अखिलेश यादव ने सरकार के तर्कों को काटते हुए कहा कि सरकार पर्यावरण बचाने और आयात बिल घटाने के नाम पर अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन वह जनता को यह नहीं बता रही है कि इस नीति की असली कीमत देश का आम नागरिक चुका रहा है।
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अखिलेश यादव के मुताबिक,
- गाड़ियों का एवरेज (माइलेज) बुरी तरह गिर रहा है, जिसके कारण लोगों को बार-बार और ज्यादा पेट्रोल डलवाना पड़ रहा है।
- गाड़ियों के इंजन और कलपुर्जे समय से पहले खराब हो रहे हैं, जिससे मेंटेनेंस का खर्च बहुत बढ़ गया है।
- गाड़ियों की ओवरऑल लाइफ कम हो रही है और सेकंड-हैंड मार्केट में उनकी रिसेल वैल्यू भी लगातार घट रही है।
उन्होंने सरकार से सीधा सवाल पूछा कि आखिर चंद बड़े मुनाफाखोरों की जेबें भरने के लिए देश की आम जनता का इस तरह शोषण क्यों किया जा रहा है?
एथेनॉल विवाद: दावे बनाम हकीकत
| विषय | आम जनता और विपक्ष का दावा | सरकार और विशेषज्ञों का पक्ष |
|---|---|---|
| गाड़ी का माइलेज | एथेनॉल की वजह से माइलेज में 15 से 40 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ रही है। | एथेनॉल से माइलेज में मामूली अंतर आ सकता है, लेकिन इतनी बड़ी गिरावट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। |
| इंजन की सुरक्षा | पुरानी गाड़ियों (E10) के रबर पार्ट्स, फ्यूल पंप और इंजन को एथेनॉल के कारण नुकसान पहुंच रहा है। | E20 ईंधन पूरी तरह से टेस्टेड है और इससे गाड़ियों के इंजन के अचानक खराब होने की बात साबित नहीं हुई है। |
| आर्थिक प्रभाव | कम माइलेज और ज्यादा मेंटेनेंस के कारण आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है। | कच्चे तेल का आयात घटने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचता है और एथेनॉल उत्पादन से किसानों की आय बढ़ती है। |
| पर्यावरण | गाड़ियों के जल्दी खराब होने और ज्यादा ईंधन जलने से पर्यावरण को अप्रत्यक्ष नुकसान हो रहा है। | यह एक ग्रीन फ्यूल है, जिससे हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम होता है और प्रदूषण पर लगाम लगती है। |
फिलहाल, सौरभ जोशी और उनकी टीम की तरफ से वीडियो से एथेनॉल वाला हिस्सा हटाने या एडिट करने को लेकर कोई भी आधिकारिक स्पष्टीकरण या बयान सामने नहीं आया है। लेकिन इस एक घटना ने यह साफ कर दिया है कि एथेनॉल मिक्स पेट्रोल को लेकर जमीनी स्तर पर आम उपभोक्ताओं और सरकार के दावों के बीच एक बहुत बड़ी खाई है, जिसे पाटना अभी बाकी है। जब तक गाड़ियों की तकनीकी अनुकूलता और माइलेज को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हो जाती, तब तक एथेनॉल को लेकर यह विवाद और बहस थमती नजर नहीं आ रही है।












