प्योंगयांग में शी जिनपिंग का भव्य स्वागत, खुद एयरपोर्ट पहुंचे किम जोंग उन
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर पहुंचे हैं। जैसे ही उनका विमान उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग के एयरपोर्ट पर उतरा, वहां का नजारा बेहद खास था। खुद उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन अपनी पत्नी री सोल जू के साथ चीनी राष्ट्रपति के स्वागत के लिए मौजूद थे।
एयरपोर्ट पर दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाया और गर्मजोशी से स्वागत किया। इस दौरान शी जिनपिंग को 21 तोपों की सलामी दी गई। उत्तर कोरिया के शीर्ष अधिकारी और सैन्य नेतृत्व भी इस खास मौके पर मौजूद थे।
सड़कों पर हजारों नागरिक पारंपरिक रंग-बिरंगे कपड़ों में नजर आए और उन्होंने चीनी राष्ट्रपति का स्वागत किया। पूरे प्योंगयांग को विशेष सजावट से सजाया गया था, जिससे यह साफ दिखाई दे रहा था कि उत्तर कोरिया इस यात्रा को कितना महत्वपूर्ण मान रहा है।
आखिर क्यों महत्वपूर्ण है यह यात्रा?
शी जिनपिंग की यह यात्रा केवल एक सामान्य कूटनीतिक दौरा नहीं मानी जा रही है। दुनिया भर के रणनीतिक विशेषज्ञ इस यात्रा पर नजर बनाए हुए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उत्तर कोरिया लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और अलगाव का सामना कर रहा है।
ऐसे समय में चीन के राष्ट्रपति का प्योंगयांग पहुंचना कई बड़े संदेश देता है। माना जा रहा है कि इस यात्रा के जरिए चीन दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वह आज भी उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा सहयोगी है।
रूस को क्या संदेश देना चाहता है चीन?
पिछले कुछ वर्षों में रूस और उत्तर कोरिया के संबंध काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच सैन्य और आर्थिक सहयोग बढ़ा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन के बीच लगातार संपर्क बढ़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया पूरी तरह रूस के प्रभाव में चला जाए। इसलिए शी जिनपिंग की यह यात्रा कहीं न कहीं किम जोंग उन को यह याद दिलाने का प्रयास है कि उत्तर कोरिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा साथी आज भी चीन ही है।
चीन उत्तर कोरिया को आर्थिक मदद देने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसका समर्थन भी करता रहा है। ऐसे में बीजिंग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि प्योंगयांग उसके प्रभाव क्षेत्र में बना रहे।
अमेरिका और जापान की चिंता क्यों बढ़ी?
शी जिनपिंग की इस यात्रा ने अमेरिका और जापान की चिंताओं को बढ़ा दिया है। दोनों देशों को डर है कि चीन, रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकियां एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल सकती हैं।
अमेरिका लंबे समय से उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहा है। वहीं जापान भी उत्तर कोरिया की मिसाइल गतिविधियों को अपने लिए बड़ा खतरा मानता है।
अब अगर चीन खुलकर उत्तर कोरिया के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
क्या दुनिया को नया संदेश देना चाहते हैं शी जिनपिंग?
मई महीने में शी जिनपिंग ने कई बड़े वैश्विक नेताओं के साथ महत्वपूर्ण बैठकें की थीं। इसके तुरंत बाद उनका उत्तर कोरिया जाना यह संकेत देता है कि चीन दुनिया को एक बड़ा संदेश देना चाहता है।
बीजिंग यह दिखाना चाहता है कि वैश्विक राजनीति का केंद्र केवल वाशिंगटन नहीं है। चीन खुद को एक ऐसी ताकत के रूप में पेश करना चाहता है जो दुनिया के कई महत्वपूर्ण मुद्दों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा चीन की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का हिस्सा है।
ट्रंप और किम जोंग उन के रिश्तों के बीच चीन की एंट्री
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार यह कह चुके हैं कि वे किम जोंग उन के साथ फिर से बातचीत शुरू करना चाहते हैं। हालांकि उत्तर कोरिया का कहना है कि जब तक उस पर लगे प्रतिबंध नहीं हटाए जाते, तब तक किसी भी बातचीत का कोई मतलब नहीं है।
ऐसे में चीन अमेरिका को यह संदेश देना चाहता है कि अगर उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम या क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े किसी भी मुद्दे का समाधान निकालना है, तो चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अमेरिकी विरोधी देशों की एकजुटता को मजबूत करने की कोशिश
कई रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शी जिनपिंग की यह यात्रा अमेरिका के विरोधी देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है।
रूस, चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकियां पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही हैं। इन तीनों देशों के बीच सहयोग बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं।
क्षेत्र का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनने की कोशिश में चीन
चीन लगातार एशिया में अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान और कोरियाई प्रायद्वीप तक, बीजिंग अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है।
उत्तर कोरिया का दौरा करके शी जिनपिंग यह दिखाना चाहते हैं कि पूर्वी एशिया में अगर कोई सबसे प्रभावशाली शक्ति है, तो वह चीन है।
इस यात्रा के जरिए चीन अपने पड़ोसी देशों और दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि क्षेत्रीय मामलों में उसकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
उत्तर कोरिया के लिए क्यों जरूरी है चीन?
उत्तर कोरिया दुनिया के सबसे अलग-थलग देशों में गिना जाता है। उस पर कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हुए हैं। इसके बावजूद चीन उसके लिए जीवनरेखा की तरह काम करता है।
उत्तर कोरिया का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार चीन के साथ होता है। इसके अलावा उसके कुल निर्यात का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा भी चीन को जाता है।
यानी अगर चीन का समर्थन कम हो जाए, तो उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है।
आर्थिक मदद का सबसे बड़ा स्रोत है चीन
उत्तर कोरिया को खाद्य सामग्री, ऊर्जा और अन्य जरूरी चीजों की आपूर्ति में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के सहयोग के बिना उत्तर कोरिया के लिए लंबे समय तक आर्थिक दबाव झेलना मुश्किल हो सकता है।
यही वजह है कि किम जोंग उन भी चीन के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं।
किम जोंग उन का बड़ा नौसैनिक सपना
हाल ही में उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने घोषणा की थी कि उनकी नौसेना को 10 हजार टन क्षमता वाला आधुनिक डिस्ट्रॉयर जहाज मिलेगा।
यह परियोजना उत्तर कोरिया की नौसैनिक ताकत को काफी बढ़ा सकती है। माना जा रहा है कि इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने के लिए उत्तर कोरिया चीन से तकनीकी या आर्थिक सहयोग की उम्मीद कर रहा है।
कुछ रिपोर्टों के अनुसार, किम जोंग उन इस परियोजना को लेकर शी जिनपिंग के सामने प्रस्ताव भी रख सकते हैं।
दक्षिण कोरिया और जापान के लिए क्या संदेश?
उत्तर कोरिया लंबे समय से दक्षिण कोरिया और जापान को अपने विरोधी देशों के रूप में देखता रहा है।
ऐसे में किम जोंग उन इस यात्रा के जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि अगर दक्षिण कोरिया और जापान के साथ अमेरिका खड़ा है, तो उत्तर कोरिया के पीछे चीन जैसी महाशक्ति मौजूद है।
इससे क्षेत्र में शक्ति संतुलन और अधिक जटिल हो सकता है।
दुनिया की नजरें प्योंगयांग पर
शी जिनपिंग और किम जोंग उन की मुलाकात केवल दो देशों के नेताओं की बैठक नहीं मानी जा रही है। इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस यात्रा से आने वाले समय में एशिया की राजनीति, सुरक्षा और वैश्विक कूटनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
यही कारण है कि अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप समेत कई देश इस यात्रा से जुड़े हर घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच होने वाले समझौते और बैठकों से कई नई रणनीतिक तस्वीरें सामने आ सकती हैं और दुनिया को यह देखने का मौका मिलेगा कि चीन और उत्तर कोरिया की यह साझेदारी भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ती है।




